
panditji Online booking for puja
जिसे तुम अपना घर कहते हो वह घर नही सराय है। क्यों ?
जिस छत के नीचे मनुष्य रहते हैं उसे वे अपना घर कहते हैं। रहने के लिए कोई व्यक्ति झोंपड़ी बनवाता है, कोई विशाल भवन बनवाता है तो कोई महल बनवाता है। प्रश्न यह उठता है कि क्या वह व्यक्ति उस महल में सदैव स्थायी रूप से रहेगा। वह एक-न-एक दिन उसे छोड़कर चला जाएगा, तब उस भवन का दूसरा स्वामी होगा। इस प्रकार उसके स्वामी एक के बाद दूसरो बनते रहेंगे। ऐसा ही एक प्रसंग आया है। अमेरिका में एक बहुत ही ऊँचे दर्जे के अधिकारी का भवन था। उसके दरवाजे पर हाथ में रायफल थामें एक दरबान खड़ा रहता था। एक फकीर उधर से गुजरा। उसकी दृष्टि उस भवन पर पड़ी। वह अचम्भे में पड़ गया। वह गेटकीपर से बोला- महोदय। इस सराय में क्या मैं एक रात के लिए रूक सकता हूँ ? गेटकीपर फकीर की बात सुनकर बोला- बाबा! वह सराय नहीं है, यह मेरे सहाब का महल है।
फकीर हँसकर बोला-जहाँ तक मुझे स्मरण है कि यह एक सराय है। यहाँ पर दूर-दराज से आने वाले यात्री आकर यहाँ पर रात बिताते हैं और चले जाते हैं।
गेटकीपर फकीर की बाते सुनकर नाराज हो गया परन्तु फकीर उस भवन को महल मानने के लिए तैयार नहीं था। उन दोनों में आपस में तकरार बढ़ती चली गई और उनकी आवाज अधिकारी तक पहुँच गई। वह अपने कक्ष से बाहर आया और फकीर से बोला- बाबा क्या बात है ? आप गेटकीपर से झगड़ रहे हैं ?
फकीर ने एक दृष्टि अधिकारी पर डाली और बोला- बेटा! यह ऊँचा मकान जिसमें से तुम निकलकर आए हो, यह यात्रियों के लिए सराय है, परन्तु यह गेटकीपर कहता है कि यह मेरे साहब का बँगला है।
तब अधिकारी बोला- हाँ बाबा! गेटकीपर ठीक कह रहा है। यह मेरा महल है। फकीर बोला-आप गलत कह रहे हैं, यह सराय ही है क्योंकि कुछ दिन पहले मैं आया था तथा इसमें कोई दूसरा रहता था।
अधिकारी बोला-वह मेरे पिता थे। फकीर पुनः बालो-उससे पहले भी मैं आया था तब कोई तीसरा व्यक्ति रह रहा था। अधिकारी ने बताया-वह मेरे दादा जी थे।
इस पर फकीर ने पूछा-बेटे! जहाँ समय-समय पर रहने वाले बदलते रहते हैं, वह सराय ही तो कहलाती है। यह सुनते ही अधिकारी को फकीर की बात समझ में आ गई। वह फकीर के पैरों पर गिर पड़ा और नम्रतापूर्वक बोला- आपका कथन सत्य है। यह महल नहीं, सराय है। आप जितने दिन रहना चाहो रह सकते हो। अपने अधिकारी की बात सुनकर गेटकीपर अवाक रह गया जबकि फकीर आगे बढ़ गया।
panditji Online booking for puja
ऐसा ही एक पौराणिक उदाहरण मिलता है। एक बार देवराज इन्द्र ने अमरावती में बहुत सुन्दर भवन का निर्माण करवाया। जब भवन बनकर तैयार हो गया और उसे भली-भाँति सजा दिया गया तो एक दिन इन्द्र ने नारायण कीर्तन करते हुए जा रहे नारद जी को रास्ते में रोककर कहा- देवर्षि! मैंने एक बहुत ही सुन्दर महल का निर्माण कराया है। कृपा उसमें पधारने की कृपा करें और बताएँ कि कैसा बना है ?
पहले तो नारद मन ही मन में मुस्कराएँ फिर बोले-हे देवराज ! मुझे महलों को परखने का ज्ञान नहीं है क्योंकि मैं तो रमता जोगी, बहता पानी हूँ। मेरा अपना तो कोई महल ही नहीं है, मुझे क्या पता कि अच्छा या सुन्दर महल कैसा होता है और असुन्दर कैसा होता है? हाँ पृथ्वी पर एक ऋषि रहते हैं तो कई हजार वर्षों से पृथ्वी पर निवास कर रहे हैं। उनका नाम लोमश ऋषि है। ओप उनके पास जाकर पूछिए। वे अवश्य बताएँगे।
देवराज इन्द्र अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर लोमश ऋषि के पास गए। वे उन्हें प्रणाम करके एक ओर खड़े हो गए क्योंकि उस समय ऋषि ध्यानमग्न थे। देवराज इन्द्र उनकी आँखें खुलने की प्रतीक्षा करते हुए इधर-उधर देखने लगे परन्तु उन्हें लोमश ऋषि का महल तो क्या एक कुटिया भी न दिखाई दी। जब ऋषि ने आँखे खोली तो देवराज इन्द्र ने उन्हें पुनः प्रणाम किया और उनसे बोले हे ऋषिवर ! क्या आपने अपने रहने के लिए कोई घर नहीं बनाया ?
घर, रहने के लिए! कहकर ऋषि हँस पड़े। वे इन्द्र से बोले- यह शरीर नश्वर है। इसका क्या भरोसा ? कब यह शरीर छूट जाएँ। तो वह बनाया हुआ घर यहीं पर रह जाएगा। जब घर साथ नहीं जाएगा तो घर बनाने का क्या लाभ ? तब आश्चर्यचकित होकर इन्द्र ने कहा-ऋषिराज ! मैंने तो सुना है कि आपकी आयु कई हजार वर्ष है। हाँ! आपके ठीक सुना है-इन्द्रदेव! मेरी आयु बहुत लम्बी है। मनुष्यों के सौ वर्ष देवताओं का एक दिन के बराबर होता है। देवताओं की आयु सौ वर्ष मानी गई है, देवताओं के सौ वर्ष व्यतीत होने पर इन्द्र बदल जाते हैं। सौ इन्द्रों के बदलने पर एक ब्रह्मा का एक रात दिन पूरा होता है। इस हिसाब से ब्रह्मा की सौ वर्ष आयु मानी गई है। जब एक ब्रह्मा बदलते हैं तब मेरे शरीर का एक रोया टूटता है। मेरे शरीर के जब समस्त रोम टूट जाएँगे तब मेरी मृत्यु होगी। फिर भी मैंने एक कुटिया भी नहीं बनाई है क्योंकि मैं जानता हूँ कि मुझे भी मरना है फिर झोपड़ी या महल बनाने में समय क्यों बरबाद करूँ ।
लोमश ऋषि की बातें सुनकर इन्द्र को ज्ञान प्राप्त हो गया और वे बिना कुछ कहे इन्द्रपुरी वापिस लौट गए।
panditji Online booking for puja
