क्या ग्रहण काल में भोजन नहीं करना चाहिएँ? धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से इसका कारण क्या है?

Book Panditji for GrehanShanti Puja

🌑 क्या ग्रहण काल में भोजन नहीं करना चाहिएँ? धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से कारण

प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनियों ने ग्रहण के समय भोजन करने को मना किया है। इसका एक गहरा कारण है। वास्तव में, ग्रहण के समय भोजन दूषित हो जाता है। उस दौरान भोजन और जल में सूक्ष्म जीवाणु प्रवेश कर जाते हैं। इसी कारण, भोजन या पानी में कुशा डालने की परंपरा चली आ रही है। माना गया है कि कुशा उन जीवाणुओं को अपने में समाहित कर लेती है।

ग्रहण समाप्त होने के बाद उस कुशा को बाहर फेंक देना चाहिए। इसके बाद, स्नान करना आवश्यक माना गया है ताकि शरीर से लगे कीटाणु पानी के साथ बह जाएँ। इस प्रकार, ग्रहण के बाद शुद्धि प्रक्रिया पूरी होती है और शरीर पुनः ऊर्जावान हो जाता है।

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🔬 वैज्ञानिक दृष्टि से ग्रहण के समय भोजन निषिद्ध क्यों है?

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो, ग्रहण के दौरान सूर्य और चन्द्रमा एक विशेष कोण पर स्थित होते हैं। इस समय, उनकी कुछ हानिकारक किरणें पृथ्वी तक पहुँचती हैं। ये किरणें वातावरण और जीवित प्राणियों दोनों को प्रभावित करती हैं।

परिणामस्वरूप, ग्रहण के दौरान शरीर की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इस अवधि में शरीर की चयापचय क्रिया धीमी हो जाती है। इसीलिए, इस समय भोजन करने से भोजन सही ढंग से नहीं पच पाता।

इसके अलावा, ग्रहण के दौरान वातावरण में सूक्ष्म जीवाणु तेजी से बढ़ने लगते हैं। यह भोजन और पेय पदार्थों को दूषित कर सकते हैं। इस कारण, प्राचीन काल में लोग भोजन को ढककर रखते थे या उसमें तुलसी और कुशा डालते थे ताकि भोजन शुद्ध बना रहे।

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🌿 तुलसी और कुशा का महत्त्व

तुलसी में औषधीय और जीवाणुनाशक गुण पाए जाते हैं। इसमें एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-ऑक्सीडेंट तत्व मौजूद होते हैं। इसलिए, ग्रहण के समय भोजन या पानी में तुलसी के पत्ते डालना लाभदायक माना गया है। यह भोजन को कीटाणुओं से बचाने में सहायक होती है।

वहीं, कुशा या दरभा घास धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। कुशा में सूक्ष्म विद्युत शक्ति होती है जो नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेती है। इसी कारण, ग्रहण के दौरान इसका उपयोग वातावरण और भोजन की शुद्धता बनाए रखने के लिए किया जाता है।

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🕉 धार्मिक दृष्टि से ग्रहण में भोजन वर्जित क्यों है?

धार्मिक दृष्टि से, ग्रहण काल को अशुभ माना गया है। ऐसा कहा गया है कि इस समय देवताओं का तेज क्षीण हो जाता है। साथ ही, वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। इसीलिए, ग्रहण के समय भोजन, यात्रा और शुभ कार्यों से बचने की सलाह दी गई है।

जबकि, यह समय आत्म-शुद्धि, ध्यान और ईश्वर-स्मरण के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। ग्रहण समाप्त होने के बाद, पुनः स्नान कर शुद्ध भोजन ग्रहण करना शुभ और पवित्र माना गया है। इस प्रकार, व्यक्ति की आत्मा और शरीर दोनों शुद्ध हो जाते हैं।

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ग्रहण के समय क्या करें और क्या न करें

करें:

  • ग्रहण शुरू होने से पहले स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • भोजन और पानी में तुलसी या कुशा डालें।
  • ग्रहण के दौरान जप, ध्यान या भक्ति-पाठ करें।
  • ग्रहण समाप्त होने के बाद पुनः स्नान कर शुद्ध भोजन ग्रहण करें।

न करें:

  • ग्रहण के समय भोजन या पेय ग्रहण न करें।
  • बाहर रखा भोजन न खाएँ।
  • गर्भवती महिलाएँ तेज प्रकाश या बाहर जाने से परहेज़ करें।

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🔯 निष्कर्ष

ग्रहण केवल एक खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव शरीर दोनों पर प्रभाव डालने वाला विशेष समय है। धार्मिक दृष्टि से, यह आत्म-शुद्धि और साधना का अवसर है। वहीं वैज्ञानिक दृष्टि से, इस दौरान शरीर की पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है और भोजन दूषित हो सकता है।

इसीलिए, ग्रहण के समय भोजन न करना स्वास्थ्य और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत लाभकारी है। अंततः, यह परंपरा केवल धार्मिक विश्वास नहीं बल्कि वैज्ञानिक सोच का सुंदर उदाहरण है।

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